नागार्जुन | Nagarjun
इस गुब्बारे की छाया में / Is Gubare Ki Chaya Me नागार्जुन - New Delhi: Vani Prakashan, 2020. - 107p.
यहाँ जो भी रचनाएँ संकलित हैं वे पहले अन्य किसी संग्रह में प्रकाशित नहीं की गयी हैं। सुविधा के लिए रचनाओं के साथ उनका लेखन वर्ष भी दे दिया गया है।
सन् 1974 में 'युगधारा' और 'सतरंगे पंखों वाली' की अधिकांश रचनाओं के साथ आठ नयी रचनाओं ('मंत्र', 'तर्पण', 'राजकमल चौधरी', 'वह कौन था', 'दूर बसे उन नक्षत्रों पर', 'देवी लिबर्टी', 'तालाब की मछलियाँ, 'और 'जयति जयति जय सर्व मंगला') को मिलाकार 'तालाब की मछिलायाँ' नामक संग्रह आया था। वह संग्रह दस-बारह वर्षों से उपलब्ध नहीं है। गत चार-पाँच वर्षों से 'युगधारा' और 'सतरंगे पंखों वाली' दोनों संग्रह अपने-अपने मूल रूप में उपलब्ध हैं। अतः उन आठों रचनाओं को किसी न किसी संग्रह में आ जाना चाहिए था। उसी क्रम में उन रचनाओं में से चार इस संग्रह में लिए जा रहे हैं।
'रामराज' की बहुचर्चित कविता है। लेकिन अब तक पूरी कविता मिल नहीं पायी है। इसके मात्र दस टुकड़े 'हंस' के जून 1949 के अंक में छपे थे जो अपूर्ण हैं। 'हंस' के अगले अंकों में कविता का शेष अंश नहीं है। सम्भव है कि किसी और पत्रिका में हो जहाँ तक हमारी पहुँच नहीं हो पायी है अब तक।
बहुत प्रयास के बाद भी पाठान्तर और पाठशोध की सम्भावना बनी हुई है यह हमारी लाचारी है
Hindi
9788170551805
Hindi Poem-- Poetry
Hindi Literature
891.431 / NAG-I
इस गुब्बारे की छाया में / Is Gubare Ki Chaya Me नागार्जुन - New Delhi: Vani Prakashan, 2020. - 107p.
यहाँ जो भी रचनाएँ संकलित हैं वे पहले अन्य किसी संग्रह में प्रकाशित नहीं की गयी हैं। सुविधा के लिए रचनाओं के साथ उनका लेखन वर्ष भी दे दिया गया है।
सन् 1974 में 'युगधारा' और 'सतरंगे पंखों वाली' की अधिकांश रचनाओं के साथ आठ नयी रचनाओं ('मंत्र', 'तर्पण', 'राजकमल चौधरी', 'वह कौन था', 'दूर बसे उन नक्षत्रों पर', 'देवी लिबर्टी', 'तालाब की मछलियाँ, 'और 'जयति जयति जय सर्व मंगला') को मिलाकार 'तालाब की मछिलायाँ' नामक संग्रह आया था। वह संग्रह दस-बारह वर्षों से उपलब्ध नहीं है। गत चार-पाँच वर्षों से 'युगधारा' और 'सतरंगे पंखों वाली' दोनों संग्रह अपने-अपने मूल रूप में उपलब्ध हैं। अतः उन आठों रचनाओं को किसी न किसी संग्रह में आ जाना चाहिए था। उसी क्रम में उन रचनाओं में से चार इस संग्रह में लिए जा रहे हैं।
'रामराज' की बहुचर्चित कविता है। लेकिन अब तक पूरी कविता मिल नहीं पायी है। इसके मात्र दस टुकड़े 'हंस' के जून 1949 के अंक में छपे थे जो अपूर्ण हैं। 'हंस' के अगले अंकों में कविता का शेष अंश नहीं है। सम्भव है कि किसी और पत्रिका में हो जहाँ तक हमारी पहुँच नहीं हो पायी है अब तक।
बहुत प्रयास के बाद भी पाठान्तर और पाठशोध की सम्भावना बनी हुई है यह हमारी लाचारी है
Hindi
9788170551805
Hindi Poem-- Poetry
Hindi Literature
891.431 / NAG-I